Saturday, November 8, 2008

ज़िन्दा है इंसान ज़िन्दा है...



ज़िन्दा है इंसान ज़िन्दा है...ज़िन्दा है इंसान ज़िन्दा है...कोई लाख हमें पाबन्द करे इंसानियत कि दावत ज़िन्दा है... ज़िन्दा है इंसान ज़िन्दा है...
हर गाव में अपनी राहों में मकतल है कहीं ज़ंजीरें है...हम दावत-ए-हक से बाज़ रहे ज़ालिम कि यहीं तदबीरें है...ज़ालिम से समजौता नामुमकिन, "लड़ने का जज़्बा ज़िन्दा है..."यह दौर ज़ुल्म का दौर सहीं, हर ओर खौफ का शोर सहीं...ज़ालिम का बज़ाहिर ज़ोर सहीं, हम लोग बडे कमज़ोर सहीं...इंसानियत पे मर मिटने के लिए, "जज़्बा-ए-शहादत ज़िन्दा है..."तसलीम हमें इनकार नहीं, यह इश्क गुलो का हार नहीं...इन राहों में गुलज़ार नहीं, कांटे है कहीं तख्लीफे है...हम सच्चाई के मजनू है, "यह अहद हमारा ज़िन्दा है..."हम अहले-वफ़ा-हक कहने से, बाज़ आये है ना आएंगे...हर ज़ख्म पे जशन मनाएंगे, हर सूली पर मुस्कायेंगे...रघ रघ में लहू कि वो गर्मी, "ज़ालिम से बगावत ज़िन्दा है..."सुन ज़ुल्मी दौर के ऍ हाकिम तकदीर पे अपनी कर मातम...इन ज़ंजीरों को तोड़ेंगे, ज़ालिम को अब ना छोडेंगे..."इंसाफ को कायम करने का, वो ख्वाब हमारा ज़िन्दा है...इंसाफ को कायम करने का, वो ख्वाब हमारा ज़िन्दा है...इंसाफ को कायम करने का, वो ख्वाब हमारा ज़िन्दा है...ज़िन्दा है इंसान ज़िन्दा है...ज़िन्दा है इंसान ज़िन्दा है...कोई लाख हमें पाबन्द करे इंसानियत कि दावत ज़िन्दा है...ज़िन्दा है इंसान ज़िन्दा है...

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